Wednesday, 7 June 2017

जानें कर्जमाफी जैसे वादों से कब-कब मिला सियासी फायदा?


कर्जमाफी को लेकर देश के चार बड़े राज्यों में किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. मध्यप्रदेश में किसानों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया है. पुलिस की फायरिंग में 6 किसानों की मौत हो गयी है. इस बीच ये सवाल उठने लगे हैं कि चुनाव से पहले तमाम राजनीतिक दल किसानों की कर्ज माफी समेत फसल के सही दाम जैसे वादे करते हैं. लेकिन चुनाव जीतने के बाद किसानों की समस्याएं भुला दी जाती हैं. हकीकत भी दरअसल कुछ ऐसी ही है. सरकार बदलती हैं, सत्ताधारी पार्टियां बदलती हैं, लेकिन किसानों की बदहाली की तस्वीर नहीं बदल पाती. इस बीच सवाल ये भी है कि क्या वाकई पार्टियों को किसानों की कर्ज माफी जैसे वादों से सियासी फायदा मिलता है?

यूपी में बीजेपी को मिला फायदा 
यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी ने किसानों की कर्ज माफी का वादा किया. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी जनसभा में प्रदेश के किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया. मोदी ने सीधे किसानों को संबोधित करते हुए आह्वान किया कि यूपी में बीजेपी की सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट मीटिंग में ही किसानों की कर्ज माफी का फैसला किया जाएगा. मोदी के इस अपील का असर चुनाव नतीजों में नजर आया. यूपी में बीजेपी को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ. सरकार बनने के बाद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी का किसानों से किया गया वादा निभाया और 36 हजार करोड़ का कर्ज माफ कर दिया.

2009 में कांग्रेस को मिला फायदा 
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2008 में देशभर के किसानों का कर्ज माफ करने का फैसला किया. मनमोहन सरकार ने किसानों का 65 हजार करोड़ का कर्ज माफ किया. मनमोहन सरकार के इस बड़े फैसले को कांग्रेस नेताओं ने 2009 के लोकसभा चुनावों में जमकर भुनाया. नतीजा ये हुआ कि एक बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी.

बीजेपी-इनेलो गठबंधन को मिली थी जीत
कर्जमाफी के वादे के साथ हरियाणा में भी बीजेपी को बड़ा फायदा मिला था. बीजेपी और इंडियन नेशनल लोकदल ने 1987 का विधानसभा चुनाव गठबंधन में लड़ा. गठबंधन ने विधानसभा चुनाव से पहले कर्ज माफी का नारा दिया. नतीजा ये हुआ कि 90 में से 76 सीटों पर गठबंधन जीत मिली और देवीलाल के नेतृत्व में सरकार बनी. सरकार ने किसानों के 25 हजार रुपये तक के सहकारी बैंकों के कर्ज माफ किए.

भले ही यूपी में बीजेपी, केंद्र में कांग्रेस और हरियाणा में बीजेपी-इनेलो गठबंधन को कर्जमाफी के वादे का फायदा चुनाव में मिला हो. लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है जब पार्टियों को निराशा हाथ लगी.

पंजाब में केजरीवाल हुए फेल
आम आदमी पार्टी ने 2017 विधानसभा चुनाव में किसानों के लिए कई बड़े वादे किए. बाकायदा किसानों के लिए मोगा में घोषणापत्र जारी किया गया. घोषणापत्र में 2018 तक सभी किसानों को कर्ज मुक्त करने का वादा किया गया. साथ ही किसानों को 12 घंटे मुफ्त बिजली, फसल बर्बाद होने पर 20 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा और काम न होने पर किसान मजदूरों को हर महीने 10 हजार रुपए देने का वादा किया.

अरविंद केजरीवाल के ये तमाम वादे पंजाब में उनकी पार्टी को सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंचा सके और कांग्रेस के कैप्टन ने बादल सरकार के खिलाफ बह रही हवाओं का रुख अपनी तरफ मोड़ लिया.

दिल्ली के किसानों को मुआवजा भी नहीं आया काम
पंजाब में कर्जमाफी के वादे से पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के किसानों को सबसे ज्यादा मुआवजा देने का दावा किया. 2015 में अरविंद केजरीवाल ने 70 प्रतिशत और उससे अधिक फसल का नुकसान झेल रहे किसानों को 20 हजार रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा दिया. केजरीवाल ने सबसे ज्यादा मुआवजा देने का दावा किया. 2017 में जब एमसीडी चुनाव हुए तो केजरीवाल की पार्टी यहां भी सत्ता हासिल नहीं कर सकी और तीनों एमसीडी पर बीजेपी को फतह मिली.

वीपी सिंह को भी नहीं मिला फायदा
साल 1990 में प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने किसानों की कर्जमाफी का निर्णय किया. तत्तकालीन केंद्र सरकार ने किसानों का 10,000 रुपये तक का कर्ज माफ किया. हालांकि, किसानों की कर्ज माफी के फैसले से केंद्र सरकार पर 10,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ भी पड़ा. इसके बाद 1991 में जब लोकसभा चुनाव हुए केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया और कांग्रेस की सरकार बनी.

बहरहाल, कभी किसी पार्टी को किसानों के मुद्दों पर फायदा मिला है, तो कहीं उनके वादे उनकी नैय्या पार लगाने में नाकाम साबित हुए हैं. पर हकीकत ये है कि कर्ज से परेशान किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. 2011-15 तक 15 सालों में देश के 2 लाख 34 हजार 642 किसानों आत्महत्या कर चुके हैं. पार्टियां और सरकारें भले ही उनके कर्ज माफ करने के दावे करती हों लेकिन देशभर के किसानों पर आज भी 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज बकाया है.

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