Monday, 12 June 2017

मूलनिवासी समुदाय क्या है ?

भारत में जाति प्रथा या गौत्र प्रथा का आरम्भ कब से हुआ इसके बारे कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन ये बात सही है कि ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों ने अपनी रणनीति के अनुसार भारत के मूलनिवासियों से अपने आप को अलग रखने के लिए ही इस व्यवस्था का निर्माण किया था। ताकि समय आने पर ब्राहमण, राजपूत और वैश्य अपने आपको पहचान कर मूलनिवासियों से अलग कर सके। आज तक भारत में जीतनी भी लड़ाईयां मूलनिवासियों और यूरोपियन आर्यों के बीच हुई है, यूरोपियन आर्यों ने मूलनिवासियों को उनके गौत्र और जाति से पहचान कर ही हर जगह छल-कपट से हराने की कोशिश की है और उस में कामयाब भी हुए है। आज भी जाति और गौत्र से ही मूलनिवासियों को पहचान कर ब्राह्मण, राजपाट और वैश्य उनके साथ व्यवहार करते है। उदहारण के लिए मंदिर के गर्भगृह में किसी भी मूलनिवासी को जाना निषेद है। लेकिन कुछ मूलनिवासियों को मंदिर के प्रांगन में जाने की छूट है, कुछ मूलनिवासी मंदिर में तो जा सकते है लेकिन प्रांगन से आगे नहीं जा सकते और कुछ मूलनिवासियों को मंदिर की चारदीवारी से बाहर ही रहना पडता है। समाज में भी कुछ ऐसे ही नियम है, कुछ मूलनिवासी ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों के घरों में जा सकते है, कुछ बाहर ही खड़े रहते है। ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों के रसोई घर में कोई भी मूलनिवासी नहीं जा सकता। ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों के साथ खाना तो आज की तारीख में भी, कोई भी मूलनिवासी नहीं खा सकता।
शुद्र संघ के अध्ययन के मुताबिक जाति प्रथा इतनी पुरानीं नहीं है जितनी पुरानी ये ब्राह्मण, राजपूत या वैश्य बताते है। अगर इतिहास का अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि 800 ईसवी तक मूलनिवासियों और यूरोपियन आर्यों के बीच जितनी भी लड़ाईयां हुई, वो लड़ाईयां मूलनिवासी और यूरोपियन आर्यों के बीच ही हुई थी। कोई ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, चमार, महार, मेघवाल या किसी और जाति का उस समय कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता। यहाँ तक गौतम बुद्ध जी ने बुद्ध धर्म को मूलनिवासियों का धर्म बताया था, जिसको हर भारतीय ने उस समय अपना धर्म मानना शुरू कर दिया था और पूरा भारत बौद्धमय हो गया था। 800 इसवी तक किसी भी मूलनिवासी ने बौद्ध धर्म को मानने से मना नहीं किया, क्योकि सारा समाज सिर्फ दो वर्गों; आर्य और अनार्य या मूलनिवासियों के बीच बंटा हुआ था।
भारतीय आर्यों के प्रवसन और आर्यन – :
पुरातत्व,भाषा विज्ञान,मानवशास्त्र,अनुवांशिक व् भौगोलिक साक्ष्यों से ज्ञात है कि आर्य अज़रबैजान से निकाले गए थे । पर्शियन इतिहास में अट्रोप्टेन व अज़रबैजान अत्रीक नदी , कश्यप सागर (केस्पियन) के निकट बताया गया है। यहीं पर बैकुंठ धाम,बहिस्ट व सत्यलोक भी था ? - काला सागर पर बसे - हितती (हिंतू) सभ्यता को विकसित किया । इनकी 6 शाखाएँ 1-आर्याप (यूरोप), 2-आर्याक (इराक),3-आर्यान (ईरान),4-आर्याभीर (अफगानिस्तान),5-आर्यवत / स्वर्गलोक/ उत्तरी भारत , 6-पाताललोक / दक्षिणी भारत में फैलीं । द्रविडीयन जाति का मुद्दा भारत में आज भी काफी विवादित है, समय-समय पर इसे लेकर राजनितिक और धार्मिक बहस छिड़ती रही है। कुछ द्रविड़ और दलित आंदोलन के समर्थक, जो आम तौर पर तमिल हैं, का विश्वास है कि शिव कि पूजा करना सिंधु सभ्यता से ही विशुद्ध द्रविड़िया परम्परा है,[जो आर्यों के हिंदू ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न है। इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रीय हिंदूत्व आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि आर्यों ने न तो किसी देश पर चढाई की और न ही कभी प्रवासन किया, वो इस बात पर जोर देते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता से निकली वैदिक विचारधारा, जो भारतीय- आर्यन के भारत में आगमन का संकेत देती है दरअसल वो पुर्तगाली- द्रविड़यान संस्कृति थी।
2000 में आन्ध्र प्रदेश में किये गए एक आनुवंशिक अध्ययन में पाया गया कि उच्च-जाति के हिंदुओं का पूर्वी यूरोपीय के लोगों से निकटतम संबंध है। जबकि छोटी जाति के लोगों के साथ ऐसा नहीं है, 2009 में (हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हे़ल्थ, एमआईटी और ब्रोड इंस्टिट्यूट ऑफ हार्वर्ड के सहयोग से) सेंटर फॉर सेलुलर एंड मोलक्युलर बायोलॉजी ने एक सर्वे कराया. इसमें भारत के 13 राज्यों में 25 जातियों के विभिन्न समूहों से संबंध रखने वाले लगभग 132 लोगों का परीक्षण किया। इस सर्वे ने इस बात पर जोर दिया कि जाति से वंश का पता लगाना मुश्किल है, रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया की जातियां आर्यन हमलों कि देन नहीं हैं और न ही इनका द्रविडियन शोषण से कोई संबंध है,जबकि यह आज भी एक विवादित विषय रहा है ?
अगर इतिहास का अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि 800 ईसवी तक मूलनिवासियों और यूरोपियन आर्यों के बीच जितनी भी लड़ाईयां हुई, वो लड़ाईयां मूलनिवासी और यूरोपियन आर्यों के बीच ही हुई थी। कोई ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, चमार, महार, मेघवाल या किसी और जाति का उस समय कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता। यहाँ तक गौतम बुद्ध जी ने बुद्ध धर्म को मूलनिवासियों का धर्म बताया था, जिसको हर भारतीय ने उस समय अपना धर्म मानना शुरू कर दिया था और पूरा भारत बौद्धमय हो गया था। 800 इसवी तक किसी भी मूलनिवासी ने बौद्ध धर्म को मानने से मना नहीं किया, क्योकि सारा समाज सिर्फ दो वर्गों; आर्य और अनार्य या मूलनिवासियों के बीच बंटा हुआ था। तो सीधी सी बात है कि हर कोई अपने समुदाय की और आकर्षित होता है और उसी से जुडना पसंद करता है। गौतम बुद्ध जी के इसी प्रयास से पुरे भारत के मूलनिवासी संगठित होते जा रहे थे और यूरोपियन आर्यों का वर्चस्व खत्म होता जा रहा था। क्योकि मूलनिवासियों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार करके ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों के धर्म के अनुसार आचरण करना छोड़ रहे थे। कोई भी मूलनिवासी यूरोपियन आर्यों की सेवा करने को तैयार नहीं था। उस समय यूरोपियन ब्राह्मणों ने चाल चली और छल कपट से बौद्ध भिक्षु बन गए। सभी मठों में ब्राह्मण भिक्षु बन कर घुस गए। 800 ईसवी में ब्राहमणों, राजपूतों और वैश्यों ने मूलनिवासी समुदाय के लोगों के खिलाफ छदम युद्ध की घोषणा कर दी और भिक्षु बने ब्राह्मणों ने मूलनिवासी भिक्षुयों से कपट करके लाखों मूलनिवासी भिक्षुयों को मरवा डाला। जिस के परिणाम स्वरुप बहुत से बौद्ध भिक्षुयों को जान से हाथ धोना पड़ा और यूरोपियन आर्यों ने छल-कपट से पुरे भारत में बौद्ध धर्म का विनाश कर दिया।अध्ययन के मुताबिक 800 ईसवी के बाद यूरोपियन आर्यों ने जाति प्रथा की नीव रखी और पुरे मूलनिवासी समाज के लोगों को कुछजातियों में बाँट दिया। ताकि मूलनिवासी समाज के लोगों में उंच नीच की भावना आ जाये और सारे मूलनिवासी आपस में ही लड़ते रहे। मूलनिवासियों के पास यूरोपियन आर्यों के खिलाफ आवाज उठाने का समय ही ना बचे। यूरोपियन आर्यों ने उस समय बंटे हुए मूलनिवासियों को जबरदस्ती भगवान का आदेश बता कर जाति प्रथा को मानने के लिए मजबूर किया। ब्राह्मण ने अपने आप को भगवान या देवताओं का दूत घोषित कर के जाति प्रथा को देश के हर कोने में पहुँचाने का काम किया। और जिन मूलनिवासियों ने जाति प्रथा को स्वीकार कर लिया उनको तो यूरोपियन आर्यों ने अपना गुलाम या दास बना लिया लेकिन जिन मूलनिवासियों ने यूरोपियन आर्यों के खिलाफ आवाज उठाई उनको या तो मार दिया या बंधक बना कर तडफा-तडफा कर मार डाला। उस समय बहुत से मूलनिवासी राजाओं ने ब्राहमणों की इस चाल को समझ कर जाति प्रथा का विरोध किया, लेकिन ब्राह्मणों ने षड्यंत्र रचा कर उन मूलनिवासी राजाओं को मार डाला और उन राज्यों पर अपना राज्य स्थापित करके वहाँ के मूलनिवासियों को जाति प्रथा को मानने के लिए मजबूर किया। आज भी उन मूलनिवासी राजाओं को असुर या राक्षस बता कर हिंदू शास्त्रों और पुराणों में जगह दी गई है। ताकि सभी मूलनिवासी उन महान राजाओं को दुष्ट समझे और उन महान राजाओं से नफरत करे।
मूलनिवासी समाज के सभी लोग आपस में जाति पाती को भूल कर विवाह करना शुरू कर दे। जब हर मूलनिवासी समुदाय आपस में विवाह सम्बन्ध बनाना शुरू करेगा तो मूलनिवासियों में से जाति प्रथा स्वत ही समाप्त हो जायेगी।

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